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Chapter 13 Verse 1
Original Verse
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||१३-१||

arjuna uvāca . prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca . etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||13-1||

Interpretation Layers

Translations & Commentary

4 curated sources available for this verse.

English Translation by Swami Gambirananda

English Translation

13.1 Swami Gambhirananda has not translated this sloka. Many editions of the Bhagavadgita do not contain this sloka, including the commentary by Sankaracharya. If this sloka is included, the total number of slokas in the Bhagavadgita is 701.

English Translation by Swami Adidevananda

English Translation

13.1 There is no such translation for this sloka.

Hindi Translation + Commentary by Swami Ramsukhdas

Hindi Translation

।।13.1।। श्रीभगवान् बोले-हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! 'यह'-रूपसे कहे जानेवाले शरीरको 'क्षेत्र' कहते हैं और इस क्षेत्रको जो जानता है, उसको ज्ञानीलोग 'क्षेत्रज्ञ' नामसे कहते हैं।

Hindi Commentary

।।13.1।।व्याख्या--'इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते'-- मनष्य 'यह पशु है, यह पक्षी है, यह वृक्ष है' आदि-आदि भौतिक चीजोंको इदंतासे अर्थात् 'यह'-रूपसे कहता है। और इस शरीरको कभी 'मैं'-रूपसे तथा कभी 'मेरा'-रूपसे कहता है। परन्तु वास्तवमें अपना कहलानेवाला शरीर भी इदंतासे कहलानेवाला ही है। चाहे स्थूलशरीर हो, चाहे सूक्ष्मशरीर हो और चाहे कारणशरीर हो, पर वे हैं सभी इदंतासे कहलानेवाले ही।    जो पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच तत्त्वोंसे बना हुआ है अर्थात् जो माता-पिताके रज-वीर्यसे पैदा होता है, उसको स्थूलशरीर कहते हैं। इसका दूसरा नाम 'अन्नमयकोश' भी है; क्योंकि यह अन्नके विकारसे ही पैदा होता है और अन्नसे ही जीवित रहता है। अतः यह अन्नमय, अन्नस्वरूप ही है। इन्द्रियोंका विषय होनेसे यह शरीर 'इदम्' ('यह') कहा जाता है। ।   पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण, मन और बुद्धि-इन सत्रह तत्त्वोंसे बने हुएको सूक्ष्मशरीर कहते हैं। इन सत्रह तत्त्वोंमेंसे प्राणोंकी प्रधानताको लेकर यह सूक्ष्मशरीर 'प्राणमयकोश', मनकी प्रधानताको लेकर यह 'मनोमयकोश' और बुद्धिकी प्रधानताको लेकर यह 'विज्ञानमयकोश' कहलाता है। ऐसा यह सूक्ष्मशरीर भी अन्तःकरणका विषय होनेसे 'इदम्' कहा जाता है। ।   अज्ञानको कारणशरीर कहते हैं। मनुष्यको बुद्धि तकका तो ज्ञान होता है, पर बुद्धिसे आगेका ज्ञान नहीं होता, इसलिये इसे अज्ञान कहते हैं। यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरोंका कारण होनेसे कारणशरीर कहलाता है—'अज्ञानमेवास्य हि मूलकारणम्' (अध्यात्म० उत्तर० ५।९)। इस कारण शरीरको स्वभाव, आदत और प्रकृति भी कह देते हैं और इसीको ‘आनन्दमयकोश' भी कह देते हैं। जाग्रत्-अवस्थामें स्थूलशरीरकी प्रधानता होती है और उसमें सूक्ष्म तथा | कारणशरीर भी साथमें रहता है। स्वप्न-अवस्थामें सूक्ष्मशरीरकी प्रधानता होती है और उसमें कारणशरीर भी साथमें रहता है। सुषुप्ति-अवस्थामें स्थूलशरीरका ज्ञान नहीं | रहता, जो कि अन्नमयकोश है और सूक्ष्मशरीरका भी ज्ञाननहीं रहता, जो कि प्राणमय, मनोमय एवं विज्ञानमयकोश है अर्थात् बुद्धि अविद्या-(अज्ञान-) में लीन हो जाती है। अतः सुषुप्ति-अवस्था कारणशरीरकी होती है। जाग्रत् और स्वप्र अवस्थामें तो सुख-दुःखका अनुभव होता है, पर सुषुप्ति अवस्थामें दुःखका अनुभव नहीं होता और सुख रहता है। इसलिये कारणशरीरको ‘आनन्दमयकोश' कहते हैं। कारण शरीर भी स्वयंका विषय होनेसे, स्वयंके द्वारा जानने में आनेवाला होनेसे 'इदम्' कहा जाता है।   उपर्युक्त तीनों शरीरोंको 'शरीर' कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण नाश होता रहता है। * इनको कोश कहनेका तात्पर्य है कि जैसे चमड़ेसे बनी हुई थैलीमें तलवार रखनेसे उसकी म्यान संज्ञा हो जाती है, ऐसे ही जीवात्माके द्वारा इन तीनों शरीरोंको अपना माननेसे, अपनेको इनमें रहनेवाला माननेसे इन तीनों शरीरोंकी ‘कोश' संज्ञा हो जाती है।  इस शरीरको क्षेत्र' कहनेका तात्पर्य है कि यह प्रतिक्षण नष्ट होता, प्रतिक्षण बदलता है। यह इतना जल्दी बदलता है कि इसको दुबारा कोई देख ही नहीं सकता अर्थात् दृष्टि पड़ते ही जिसको देखा, उसको फिर दुबारा नहीं देख सकते; क्योंकि वह तो बदल गया।   शरीरको क्षेत्र कहनेका दूसरा भाव खेतसे है। जैसे खेतमें तरह-तरहके बीज डालकर खेती की जाती है, ऐसे ही इस मनुष्य-शरीरमें अहंता-ममता करके जीव तरह-तरहके कर्म करता है। उन कर्मोके संस्कार अन्तःकरणमें पड़ते हैं। वे संस्कार जब फलके रूपमें प्रकट होते हैं, तब दूसरा (देवता, पशु-पक्षी, कीट-पतङ्ग आदिका) शरीर मिलता है। जिस प्रकार खेतमें जैसा बीज बोया जाता है, वैसा ही अनाज पैदा होता है, उसी प्रकार इस शरीरमें जैसे कर्म किये जाते हैं, उनके अनुसार ही दूसरे शरीर, परिस्थिति आदि मिलते हैं। तात्पर्य है कि इस शरीरमें किये गये कोंक अनुसार ही यह जीव बार-बार जन्म मरणरूप फल भोगता है। इसी दृष्टि से इसको क्षेत्र (खेत) कहा गया है।   अपने वास्तविक स्वरूपसे अलग दीखनेवाला यह शरीर प्राकृत पदार्थोंसे, क्रियाओंसे, वर्ण-आश्रम आदिसे 'इदम्' (दृश्य) ही है। यह है तो 'इदम्' पर जीवने भूलसे इसको 'अहम्' मान लिया और फँस गया। स्वयं परमात्माका अंश एवं चेतन है, सबसे महान् है। परन्तु जब वह जड (दृश्य) पदार्थोंसे अपनी महत्ता मानने लगता है। (जैसे, 'मैं धनी हूँ', 'मैं विद्वान् हूँ' आदि), तब वास्तवमें वह अपनी महत्ता घटाता ही है। इतना ही नहीं, अपनी महान् बेइज्जती करता है; क्योंकि अगर धन, विद्या आदिसे वह अपनेको बड़ा मानता है, तो धन विद्या आदि ही बड़े हुए; उसका अपना महत्त्व तो कुछ रहा ही नहीं ! वास्तवमें देखा जाय तो महत्त्व स्वयंका ही है, नाशवान् और जड धनादि पदार्थोंका नहीं; क्योंकि जब स्वयं उन पदार्थोंको स्वीकार करता है, तभी वे महत्त्वशाली दीखते हैं। इसलिये भगवान 'इदं शरीरं क्षेत्रम्' पदोंसे शरीरादि पदार्थोंको अपनेसे भिन्न 'इदंता' से देखनेके लिये कह रहे हैं। _   'एतद्यो वेत्ति' -जीवात्मा इस शरीरको जानता है अर्थात् यह शरीर मेरा है, इन्द्रियाँ मेरी हैं, मन मेरा है, बुद्धि मेरी है, प्राण मेरे हैं—ऐसा मानता है। यह जीवात्मा इस शरीरको कभी 'मैं' कह देता है और कभी 'यह' कह देता है अर्थात् 'मैं शरीर हूँ'- ऐसा भी मान लेता है और ‘यह शरीर मेरा है' — ऐसा भी मान लेता है। ___   इस श्लोकके पूर्वार्धमें शरीरको 'इदम्' पदसे कहा है और उत्तरार्धमें शरीरको 'एतत्' पदसे कहा है। यद्यपि ये दोनों ही पद नजदीकके वाचक हैं, तथापि 'इदम्' की अपेक्षा 'एतत्' पद अत्यन्त नजदीकका वाचक है। अतः यहाँ 'इदम्' पद अङ्गुलिनिर्दिष्ट शरीर-समुदायका द्योतन करता है और 'एतत्' पद इस शरीरमें जो 'मैं'-पन है, उस मैं-पनका द्योतन करता है। _   'तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ, इति तद्विदः' -जैसे दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें सत्-असत्के तत्त्वको जानने वालोंको तत्त्वदर्शी कहा है, ऐसे ही यहाँ क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके तत्त्वको जाननेवालोंको 'तद्विदः' कहा है। क्षेत्र क्या है और क्षेत्रज्ञ क्या है-इसका जिनको बोध हो चुका है, ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुष इस जीवात्माको क्षेत्रज्ञ' नामसे कहते हैं। तात्पर्य है कि क्षेत्रकी तरफ दृष्टि रहनेसे, क्षेत्रके साथ सम्बन्ध रहनेसे ही इस जीवात्माको वे ज्ञानी महापुरुष क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। अगर यह जीवात्मा क्षेत्रके साथ सम्बन्ध न रखे, तो फिर इसकी क्षेत्रज्ञ' संज्ञा नहीं रहेगी, यह परमात्मस्वरूप हो जायगा (गीता १३ । ३१) ।   मार्मिक बात   यह नियम है कि जहाँसे बन्धन होता है, वहाँसे खोलनेपर ही (बन्धनसे) छुटकारा हो सकता है। अतः मनष्यशरीरसे ही बन्धन होता है और मनुष्यशरीरके द्वारा ही बन्धनसे मुक्ति हो सकती है। अगर मनुष्यका अपने शरीरके साथ किसी प्रकारका भी अहंता-ममतारूप सम्बन्ध न रहे, तो वह मात्र संसारसे मुक्त ही है। अतः भगवान् शरीरके साथ माने हुए अहंता-ममतारूप सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये शरीरको क्षेत्र' बताकर उसको इदंता-(पृथक्ता-) से देखने के लिये कह रहे हैं, जो कि वास्तवमें पृथक् है ही।   शरीरको इदंतासे देखना केवल अपना कल्याण चाहने- वाले साधकोंके लिये ही नहीं, प्रत्युत मनुष्यमात्रके लिये परम आवश्यक है। कारण कि अपना उद्धार करनेका अधिकार और अवसर मनुष्यशरीरमें ही है। यही कारण है कि गीताका उपदेश आरम्भ करते ही भगवान्ने सबसे पहले शरीर और शरीरीकी पृथक्ताका वर्णन किया है।   'इदम्' का अर्थ है—'यह' अर्थात् अपनेसे अलग दीखनेवाला। सबसे पहले देखनेमें आता है—पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाशसे बना यह स्थूलशरीर । यह दृश्य है और परिवर्तनशील है। इसको देखनेवाले हैं—नेत्र । जैसे दृश्यमें रंग, आकृति, अवस्था, उपयोग आदि सभी बदलते रहते हैं, पर उनको देखनेवाले नेत्र एक ही रहते हैं, ऐसे ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय भी बदलते रहते हैं, पर उनको जाननेवाले कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका एक ही रहते हैं। जैसे नेत्रोंसे ठीक दीखना, कम दीखना और बिलकुल न दीखना-ये नेत्रमें होनेवाले परिवर्तन मनके द्वारा जाने जाते हैं, ऐसे ही कान, त्वचा, जिह्वा और नासिकामें होनेवाले परिवर्तन भी मनके द्वारा जाने जाते हैं। अतः पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, त्वचा, नेत्र जिह्वा और नासिका) भी दृश्य हैं। कभी क्षुब्ध और कभी शान्त, कभी स्थिर और कभी चञ्चल-ये मनमें होनेवाले परिवर्तन बुद्धिके द्वारा जाने जाते हैं । अतः मन भी दृश्य है । कभी ठीक समझना, कभी कम समझना और कभी बिलकुल न समझना-ये बुद्धिमें होनेवाले परिवर्तन स्वयं-(जीवात्मा-) के द्वारा जाने जाते हैं। अतः बुद्धि भी दृश्य है। बुद्धि आदिके द्रष्टा स्वयं-(जीवात्मा-) में कभी परिवर्तन हुआ नहीं, है नहीं, होगा नहीं और होना सम्भव भी नहीं । वह सदा एकरस रहता है; अतः वह कभी किसीका दृश्य नहीं हो सकता*। ।   इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयको तो जान सकती हैं, पर विषय अपनेसे पर (सूक्ष्म, श्रेष्ठ और प्रकाशक) इन्द्रियोंको नहीं जान सकते । इसी तरह इन्द्रियाँ और विषय मनको नहीं जान सकते; मन, इन्द्रियाँ और विषय बुद्धिको नहीं जान सकते; तथा बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और विषय स्वयंको नहीं जान सकते । न जाननेमें मुख्य कारण यह है कि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तो सापेक्ष द्रष्टा हैं अर्थात् एक-दूसरेकी सहायतासे केवल अपनेसे स्थूल रूपको देखनेवाले हैं; किन्तु स्वयं (जीवात्मा) शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिसे अत्यन्त सूक्ष्म और श्रेष्ठ होनेके कारण निरपेक्ष द्रष्टा है अर्थात् दूसरे किसीकी सहायताके बिना खुद ही देखनेवाला है।   उपर्युक्त विवेचनमें यद्यपि इन्द्रियाँ, मन और बुद्धिको भी द्रष्टा कहा गया है, तथापि वहाँ भी यह समझ लेना चाहिये कि स्वयं-(जीवात्मा-) के साथ रहनेपर ही इनके द्वारा देखा जाना सम्भव होता है। कारण कि मन, बुद्धि आदि जड प्रकृतिका कार्य होनेसे स्वतन्त्र द्रष्टा नहीं हो सकते। अतः स्वयं ही वास्तविक द्रष्टा है। दृश्य पदार्थ (शरीर), देखनेकी शक्ति (नेत्र, मन, बुद्धि) और देखनेवाला (जीवात्मा) इन तीनोंमें गुणोंकी भिन्नता होनेपर भी तात्त्विक एकता है। कारण कि तात्त्विक एकताके बिना देखनेका आकर्षण, देखनेकी सामर्थ्य और देखनेकी प्रवृत्ति सिद्ध ही नहीं होती। यहाँ यह शङ्का हो सकती है कि स्वयं (जीवात्मा) तो चेतन है, फिर वह जड बुद्धि आदिको (जिससे उसकी तात्त्विक एकता नहीं है।) कैसे देखता है? इसका समाधान यह है कि स्वयं जडसे तादात्म्य करके जडके सहित अपनेको 'मैं' मान लेता है। यह 'मैं' न तो जड है और न चेतन ही है। जडमें विशेषता देखकर यह जडके साथ एक होकर कहता है कि 'मैं धनवान् हूँ; मैं विद्वान् हूँ' आदि; और चेतनमें विशेषता देखकर यह चेतनके साथ एक होकर कहता है कि 'मैं आत्मा हूँ: मैं ब्रह्म हूँ' आदि । यही प्रकृतिस्थ पुरुष है, जो प्रकृतिजन्य गणोंके सङ्गसे ऊँच-नीच योनियोंमें बार-बार जन्म लेता रहता है (गीता १३ । २१) । तात्पर्य यह निकला कि प्रकृतिस्थ पुरुषमें जड और चेतन-दोनों अंश विद्यमान हैं। चेतनकी रुचि परमात्माकी तरफ जानेकी है; किन्तु भूलसे उसने जडके साथ तादात्म्य कर लिया। तादात्म्यमें जो जड-अंश है, उसका आकर्षण (प्रवृत्ति) जडताकी तरफ होनेसे वही सजातीयताके कारण जड बुद्धि आदिका द्रष्टा बनता है । यह नियम है कि देखना केवल सजातीयतामें ही सम्भव होता है |अर्थात् दृश्य, दर्शन और द्रष्टाके एक ही जातिके होनेसे देखता होता है अन्यथा नहीं। इस नियमसे यह पता लगता है कि स्वयं (जीवात्मा) जबतक बद्धि आदि द्रष्टा रहता है,तबतक उसमें बुद्धिकी जातिकी जड वस्तु है अर्थात जड प्रकृतिके साथ उसका माना हुआ सम्बन्ध है। यह माना हु्आ सम्बन्ध ही सब अनर्थोंका मूल है। इसी माने हुए सम्बन्धके कारण वह सम्पूर्ण जड प्रकृति अर्थात् बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ, विषय, शरीर और पदार्थोंका द्रष्टा बनता है।   सम्बन्ध--उस क्षेत्रज्ञका स्वरुप क्या है-इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

English Translation + Commentary by A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

English Translation

Arjuna said: O Keshava, I wish to understand what is Prakriti (nature), Purusha (the enjoyer), and the field and the knower of the field, and what are knowledge and the object of knowledge.

English Commentary

Arjuna was inquisitive about prakṛti (nature), puruṣa (the enjoyer), kṣetra (the field), kṣetra-jña (its knower), and knowledge and the object of knowledge. When he inquired about all these, Kṛṣṇa said that this body is called the field and that one who knows this body is called the knower of the field. This body is the field of activity for the conditioned soul. The conditioned soul is entrapped in material existence, and he attempts to lord it over material nature. And so, according to his capacity to dominate material nature, he gets a field of activity. That field of activity is the body. And what is the body? The body is made of senses. The conditioned soul wants to enjoy sense gratification, and, according to his capacity to enjoy sense gratification, he is offered a body, or field of activity. Therefore the body is called kṣetra, or the field of activity for the conditioned soul. Now, the person, who should not identify himself with the body, is called kṣetra-jña, the knower of the field. It is not very difficult to understand the difference between the field and its knower, the body and the knower of the body. Any person can consider that from childhood to old age he undergoes so many changes of body and yet is still one person, remaining. Thus there is a difference between the knower of the field of activities and the actual field of activities. A living conditioned soul can thus understand that he is different from the body. It is described in the beginning – dehino ’smin – that the living entity is within the body and that the body is changing from childhood to boyhood and from boyhood to youth and from youth to old age, and the person who owns the body knows that the body is changing. The owner is distinctly kṣetra-jña. Sometimes we think, “I am happy,” “I am a man,” “I am a woman,” “I am a dog,” “I am a cat.” These are the bodily designations of the knower. But the knower is different from the body. Although we may use many articles – our clothes, etc. – we know that we are different from the things used. Similarly, we also understand by a little contemplation that we are different from the body. I or you or anyone else who owns the body is called kṣetra-jña, the knower of the field of activities, and the body is called kṣetra, the field of activities itself. In the first six chapters of Bhagavad-gītā the knower of the body (the living entity) and the position by which he can understand the Supreme Lord are described. In the middle six chapters of the Bhagavad-gītā the Supreme Personality of Godhead and the relationship between the individual soul and the Supersoul in regard to devotional service are described. The superior position of the Supreme Personality of Godhead and the subordinate position of the individual soul are definitely defined in these chapters. The living entities are subordinate under all circumstances, but in their forgetfulness they are suffering. When enlightened by pious activities, they approach the Supreme Lord in different capacities – as the distressed, those in want of money, the inquisitive, and those in search of knowledge. That is also described. Now, starting with the Thirteenth Chapter, how the living entity comes into contact with material nature and how he is delivered by the Supreme Lord through the different methods of fruitive activities, cultivation of knowledge, and the discharge of devotional service are explained. Although the living entity is completely different from the material body, he somehow becomes related. This also is explained.