idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana . na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo.abhyasūyati ||18-67||
Translations & Commentary
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English Translation by Swami Gambirananda
18.67 This (that I have taught) you should not ever be taught to one who is devoid of austerities and to one who is not a devotee; also, neither to one who does not render service, nor as well to one who cavils at Me.
English Translation by Swami Adidevananda
18.67 Never should this be told by you to one who is not austere, who is not a devotee, nor to one who has no wish to listen, nor certainly to him who traduces Me.
Hindi Translation + Commentary by Swami Ramsukhdas
।।18.67।।यह सर्वगुह्यतम वचन अतपस्वीको मत कहना; अभक्तको कभी मत कहना; जो सुनना नहीं चाहता, उसको मत कहना; और जो मेरेमें दोषदृष्टि करता है, उससे भी मत कहना।
।।18.67।। व्याख्या -- इदं ते नातपस्काय -- पूर्वश्लोकमें आये सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज -- इस सर्वगुह्यतम वचनके लिये यहाँ इदम् पद आया है।अपने कर्तव्यका पालन करते हुए स्वाभाविक जो कष्ट आ जाय? विपरीत परिस्थिति आ जाय? उसको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नामतप है। तपके बिना अन्तःकरणमें पवित्रता नहीं आती? और पवित्रता आये बिना अच्छी बातें धारण नहीं होतीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो तपस्वी नहीं है? उसको यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये।जो सहिष्णु अर्थात् सहनशील नहीं है? वह भी अतपस्वी है। अतः उसको भी यह सर्वगुह्यतम रहस्य नहीं कहना चाहिये। यह सहिष्णुता चार प्रकारकी होती है --,(1) द्वन्द्वसहिष्णुता -- रागद्वेष? हर्षशोक? सुखदुःख? मानअपमान? निन्दास्तुति आदि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाना -- ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ताः (गीता 7। 28) द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैः गीता (15। 5)।(2) वेगसहिष्णुता -- काम? क्रोध? लोभ? द्वेष आदिके वेगोंको उत्पन्न न होने देना -- कामक्रोधोद्भवं वेगम् (गीता 5। 23)।(3) परमतसहिष्णुता -- दूसरोंके मतकी महिमा सुनकर अपने मतमें सन्देह न होना और उनके मतसे उद्विग्न न होना (टिप्पणी प0 987.1) -- एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति (गीता 5। 5)।(4) परोत्कर्षसहिष्णुता -- अपनेमें योग्यता? अधिकार? पद? त्याग? तपस्या आदिकी कमी है? तो भी दूसरोंकी योग्यता? अधिकार आदिकी प्रसंशा सुनकर अपनेमें कुछ भी विकार न होना -- विमत्सरः (गीता 4। 22) हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तः (गीता 12। 15)।ये चारों सहिष्णुताएँ सिद्धोंकी हैं। ये सहिष्णुताएँ जिसका लक्ष्य हों? वही तपस्वी है और जिसका लक्ष्य न हों? वही अतपस्वी है।ऐसे अतपस्वी अर्थात् असहिष्णु (टिप्पणी प0 987.2) को सर्वगुह्यतम रहस्य न सुनानेका मतलब है किसम्पूर्ण धर्मोंको मेरेमें अर्पण करके तू अनन्यभावसे मेरी शरण आ जा -- इस बात को सुनकर उसके मनमें कोई विपरीत भावना या दोष आ जाय? तो वह मेरी इस सर्वगुह्यतम बातको सह नहीं सकेगा और इसका निरादर करेगा? जिससे उसका पतन हो जायगा।दूसरा भाव यह है कि जिसका अपनी वृत्तियों? आचरणों? भावों आदिको शुद्ध करनेका उद्देश्य नहीं है? वह यदि मेरीतू मेरी शरणमें आ जा? तो मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? तू चिन्ता मत कर -- इन बातोंको सुनेगा तोमैं चिन्ता क्यों करूँ चिन्ता भगवान् करेंगे ऐसा उल्टा समझकर दुर्गणदुराचारोंमें लग जायगा और अपना अहित कर लेगा। इससे मेरी सर्वगुह्यतम् बातका दुरुपयोग होगा। अतः इसे कुपात्रको कभी मत सुनाना।नाभक्ताय कदाचन -- जो भक्तिसे रहित है? जिसका भगवान्पर भरोसा? श्रद्धाविश्वास और भक्ति न होनेसे उसकी यह विपरीत धारणा हो सकती है किभगवान् जो आत्मश्लाघी हैं? स्वार्थी हैं और दूसरोंको वशमें करना चाहते हैं। जो दूसरोंको अपनी आज्ञामें चलाना चाहता है? वह दूसरोंको क्या निहाल करेगा उसके शरण होनेसे क्या लाभ आदिआदि। इस प्रकार दुर्भाव करके वह अपना पतन कर लेगा। इसलिये ऐसे,अभक्तको कभी मत कहना।न चाशुश्रूषवे वाच्यम् -- जो इस रहस्यको सुनना नहीं चाहता? इसकी उपेक्षा करता है? उसको भी कभी मत सुनाना क्योंकि बिना रुचिके? जबर्दस्ती सुनानेसे वह इस बातका तिरस्कार करेगा? उसको सुनना अच्छा नहीं लगेगा? उसका मन इस बातको फेंकेगा। यह भी उसके द्वारा एक अपराध होगा। अपराध करनेवालेका भला नहीं होता। अतः जो सुनना नहीं चाहता? उसको मत सुनाना।न च मां योऽभ्यसूयति -- जो गुणोंमें दोषारोपण करता है? उसको भी मत सुनाना क्योंकि उसका अन्तःकरण अत्यधिक मलिन होनेके कारण वह भगवान्की बात सुनकर उलटे उनमें दोषारोपण ही करेगा।दोषदृष्टि रहनेसे मनुष्य महान् लाभसे वञ्चित हो जाता है और अपना पतन कर लेता है। अतः दोषदृष्टि करना बड़ा भारी दोष है। यह दोष श्रद्धालुओंमें भी रहता है। इसलिये साधकको सावधान होकर इस भयंकर दोषसे बचते रहना चाहिये। भगवान्ने भी (गीता 3। 31में) जहाँ अपना मत बताया? वहाँ श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः पदोंसे यह बात कही कि श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य कर्मोंसे छूट जाता है। ऐसे ही गीताके माहात्म्य (गीता 18। 71) में भी श्रद्धावाननसूयश्च पदोंसे यह बताया कि श्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित मनुष्य केवल गीताको सुननेमात्रसे वैकुण्ठ आदि लोकोंको चला जाता है।इस गोपनीय रहस्यको दूसरोंसे मत कहना -- यह कहनेका तात्पर्य दूसरोंको इस गोपनीय तत्त्वसे वञ्चित रखना नहीं है? प्रत्युत जिसकी भगवान् और उनके वचनोंपर श्रद्धाभक्ति नहीं है? वह भगवान्को स्वार्थी समझकर (जैसे साधारण मनुष्य अपने स्वार्थके लिये ही किसीको स्वीकार करते हैं)? भगवान्पर दोषारोपण करके महान् पतनकी तरफ न चला जाय? इसलिये उसको कहनेका निषेध किया है। सम्बन्ध -- गीताजीका यह प्रभाव है कि जो प्रचार करेगा? उससे बढ़कर मेरा प्यारा कोई नहीं होगा -- यह बात भगवान् आगेको दो श्लोकोंमें बताते हैं।
English Translation + Commentary by A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada
This confidential knowledge may never be explained to those who are not austere, or devoted, or engaged in devotional service, nor to one who is envious of Me.
Persons who have not undergone the austerities of the religious process, who have never attempted devotional service in Kṛṣṇa consciousness, who have not tended a pure devotee, and especially those who are conscious of Kṛṣṇa only as a historical personality or who are envious of the greatness of Kṛṣṇa should not be told this most confidential part of knowledge. It is, however, sometimes found that even demoniac persons who are envious of Kṛṣṇa, worshiping Kṛṣṇa in a different way, take to the profession of explaining Bhagavad-gītā in a different way to make business, but anyone who desires actually to understand Kṛṣṇa must avoid such commentaries on Bhagavad-gītā . Actually the purpose of Bhagavad-gītā is not understandable to those who are sensuous. Even if one is not sensuous but is strictly following the disciplines enjoined in the Vedic scripture, if he is not a devotee he also cannot understand Kṛṣṇa. And even when one poses himself as a devotee of Kṛṣṇa but is not engaged in Kṛṣṇa conscious activities, he also cannot understand Kṛṣṇa. There are many persons who envy Kṛṣṇa because He has explained in Bhagavad-gītā that He is the Supreme and that nothing is above Him or equal to Him. There are many persons who are envious of Kṛṣṇa. Such persons should not be told of Bhagavad-gītā , for they cannot understand. There is no possibility of faithless persons’ understanding Bhagavad-gītā and Kṛṣṇa. Without understanding Kṛṣṇa from the authority of a pure devotee, one should not try to comment upon Bhagavad-gītā .