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Chapter 2 Verse 44
Original Verse
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ||२-४४||

bhogaiśvaryaprasaktānāṃ tayāpahṛtacetasām . vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||2-44||

Interpretation Layers

Translations & Commentary

4 curated sources available for this verse.

English Translation by Swami Gambirananda

English Translation

2.44 One-pointed conviction does not become established in the minds of those who delight in enjoyment and affluence, and whose intellects are carried away by that (speech).

English Translation by Swami Adidevananda

English Translation

2.42 - 2.44 O! Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, 'There is nothing else.' They are full only of wordly desires and they hanker for heaven. They speak flowery words which offer rirth as the fruit of work. They look upon the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a concentrated mind.

Hindi Translation + Commentary by Swami Ramsukhdas

Hindi Translation

।।2.44।। उस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।

Hindi Commentary

2.44।। व्याख्या -- 'तयापहृतचेतसाम्'-- पूर्वश्लोकोंमें जिस पुष्पित वाणीका वर्णन किया गया है  उस वाणीसे जिनका चित्त अपहृत हो गया है अर्थात् स्वर्गमें बड़ा भारी सुख है दिव्य नन्दनवन है अप्सराएँ हैं अमृत है ऐसी वाणीसे जिनका चित्त उन भोगोंकी तरफ खिंच गया है।  'भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्'-- शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय शरीरका आराम मान और नामकी बड़ाई इनके द्वारा सुख लेनेका नाम भोग है। भोगोंके लिये पदार्थ रूपयेपैसे मकान आदिका जो संग्रह किया जाता है उसका नाम ऐश्वर्य है। इन भोग और ऐश्वर्यमें जिनकी आसक्ति है प्रियता है खिंचाव है अर्थात् इनमें जिनकी महत्त्वबुद्धि है उनको  'भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्'  कहा गया है। जो भोग और ऐश्वर्यमें ही लगे रहते हैं वे आसुरी सम्पत्तिवाले होते हैं। कारण कि असु नाम प्राणोंका है और उन प्राणोंको जो बनाये रखना चाहते हैं उन प्राणपोषणपरायण लोगोंका नाम असुर है। वे शरीरकी प्रधानताको लेकर यहाँके अथवा स्वर्गके भोग भोगना चाहते हैं  (टिप्पणी प0 80) ।  'व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते'-- जो मनुष्यजन्मका असली ध्येय है जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला है उस परमात्माको ही प्राप्त करना है ऐसी व्यवसायात्मिका बुद्धि उन लोगोंमें नहीं होती। तात्पर्य यह है कि जो भोग भोगे जा चुके हैं जो भोग भोगे जा सकते हैं जिन भोगोंको सुन रखा है और जो भोग सुने जा सकते हैं उनके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता रहती है उस मलिनताके कारण संसारसे सर्वथा विरक्त होकर एक परमात्माकी तरफ चलना है ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं होता। ऐसे ही संसारकी अनेक विद्याओं कलाओं आदिका जो संग्रह है उससे मैं विद्वान हूँ मैं जानकार हूँ ऐसा जो अभिमानजन्य सुखका भोग होता है उसमें आसक्त मनुष्योंका भी परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय नहीं होता।  विशेष बात  परमदयालु प्रभुने कृपा करके इस मनुष्यशरीरमें एक ऐसी विलक्षण विवेकशक्ति दी है जिससे वह सुखदुःखसे ऊँचा उठ जाय अपना उद्धार कर ले सबकी सेवा करके भगवान्तकको अपने वशमें कर ले इसीमें मनुष्यशरीरकी सार्थकता है। परन्तु प्रभुप्रदत्त इस विवेकशक्तिका अनादर करके नाशवान् भोग और संग्रहमें आसक्त हो जाना पशुबुद्धि है। कारण कि पशुपक्षी भी भोगोंमें लगे रहते हैं ऐसे ही अगर मनुष्य भी भोगोंमें लगा रहे तो पशुपक्षियोंमें और मनुष्यमें अन्तर ही क्या रहा पशुपक्षी तो भोगयोनि है अतः उनके सामने कर्तव्यका प्रश्न ही नहीं है। परन्तु मनुष्यजन्म तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करके अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है भोग भोगनेके लिये नहीं। इसलिये मनुष्यके सामने जो कुछ अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है वह सब साधनसामग्री है भोगसामग्री नहीं। जो उसको भोगसामग्री मान लेते हैं उनकी परमात्मामें व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती। वास्तवमें सांसारिक पदार्थ परमात्माकी तरफ चलनेमें बाधा नहीं देते प्रत्युत वर्तमानमें जो भोगोंका महत्व अन्तःकरणमें बैठा हुआ है वही बाधा देता है। भोग उतना नहीं अटकाते जितना भोगोंका महत्व अटकाता है। अटकानेमें अपनी रुचि नीयतकी प्रधानता है। भोग और संग्रहकी रुचिको रखते हुए कोई परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो परमात्माकी प्राप्ति तो दूर रही उनकी प्राप्तिका एक निश्चय भी नहीं हो सकता। कारण कि जहाँ परमात्माकी तरफ चलनेकी रुचि है वहीं भोगोंकी रुचि भी है। जबतक भोग और संग्रहमें मानबड़ाईआराममें रुचि है तबतक कोई भी एक निश्चय करके परमात्मामें नहीं लग सकता क्योंकि उसका अन्तःकरण भोगोंकी रुचिद्वारा हर लिया गया उसकी जो शक्ति थी वह भोग और संग्रहमें लग गयी। सम्बन्ध-- किसी बातको पुष्ट करना हो तो पहले उसके दोनों पक्ष सामने रखकर फिर उसको पुष्ट किया जाता है। यहाँ भगवान् निष्कामभावको पुष्ट करना चाहते हैं अतः पीछेके तीन श्लोकोंमें सकामभाववालोंका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें निष्काम होनेकी प्रेरणा करते हैं।

English Translation + Commentary by A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

English Translation

In the minds of those who are too attached to sense enjoyment and material opulence, and who are bewildered by such things, the resolute determination for devotional service to the Supreme Lord does not take place.

English Commentary

Samādhi means “fixed mind.” The Vedic dictionary, the Nirukti, says, samyag ādhīyate ’sminn ātma-tattva-yāthātmyam: “When the mind is fixed for understanding the self, it is said to be in samādhi .” Samādhi is never possible for persons interested in material sense enjoyment and bewildered by such temporary things. They are more or less condemned by the process of material energy.