Valmiki Ramayana Bala Kanda Sarga 63 Shloka 13
Original Shlokaविनिश्श्वसन्मुनिवर: पश्चात्तापेन दु:खित:। भीतामप्सरसं दृष्ट्वा वेपन्तीं प्राञ्जलिं स्थिताम्।।1.63.12।। मेनकां मधुरैर्वाक्यैर्विसृज्य कुशिकात्मज:। उत्तरं पर्वतं राम विश्वामित्रो जगाम ह।।1.63.13।।