Skip to content
← Back to Chapter
Chapter 7 Verse 16
Original Verse
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन | आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ||७-१६||

caturvidhā bhajante māṃ janāḥ sukṛtino.arjuna . ārto jijñāsurarthārthī jñānī ca bharatarṣabha ||7-16||

Interpretation Layers

Translations & Commentary

4 curated sources available for this verse.

English Translation by Swami Gambirananda

English Translation

7.16 O Arjuna, foremost of the Bharata dynasty, four classes of people of virtuous deeds adore Me: the afflicted, the seeker of Knowledge, the seeker of wealth and the man of Knowledge.

English Translation by Swami Adidevananda

English Translation

7.16 Four types of men of good deeds worship Me, O Arjuna, These are the distressed, the seekers after knowledge, the wealth-seekers, and the men of knowledge.

Hindi Translation + Commentary by Swami Ramsukhdas

Hindi Translation

।।7.16।। हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

Hindi Commentary

।।7.16।। व्याख्या--'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन'--सुकृती पवित्रात्मा मनुष्य अर्थात् भगवत्सम्बन्धी काम करनेवाले मनुष्य चार प्रकारके होते हैं। ये चारों मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् स्वयं मेरे शरण होते हैं।पूर्वश्लोकमें 'दुष्कृतिनः' पदसे भगवान्में न लगने-वाले मनुष्योंकी बात आयी थी। अब यहाँ 'सुकृतिनः' पदसे भगवान्में लगनेवाले मनुष्योंकी बात कहते हैं। ये सुकृती मनुष्य शास्त्रीय सकाम पुण्य-कर्म करनेवाले नहीं हैं, प्रत्युत भगवान्से अपना सम्बन्ध जोड़कर भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेवाले हैं। सुकृती मनुष्य दो प्रकारके होते हैं--एक तो यज्ञ, दान, तप आदि और वर्ण-आश्रमके शास्त्रीय कर्म भगवान्के लिये करते हैं अथवा उनको भगवान्के अर्पण करते हैं और दूसरे भगवन्नामका जप तथा कीर्तन करना, भगवान्की लीला सुनना तथा कहना आदि केवल भगवत्सम्बन्धी कर्म करते हैं।जिनकी भगवान्में रुचि हो गयी है, वे ही भाग्यशाली हैं, वे ही श्रेष्ठ हैं और वे ही मनुष्य कहलाने-योग्य हैं। वह रुचि चाहे किसी पूर्व पुण्यसे हो गयी हो, चाहे आफतके समय दूसरोंका सहारा छूट जानेसे हो गयी हो, चाहे किसी विश्वसनीय मनुष्यके द्वारा समयपर धोखा देनेसे हो गयी हो, चाहे, सत्सङ्ग स्वाध्याय अथवा विचार आदिसे हो गयी हो, किसी भी कारणसे भगवान्में रुचि होनेसे वे सभी सुकृती मनुष्य हैं।जब भगवान्की तरफ रुचि हो जाय, वही पवित्र दिन है, वही निर्मल समय है और वही सम्पत्ति है। जब भगवान्की तरफ रुचि नहीं होती, वही काला दिन है, वही विपत्ति है-- 'कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।'(मानस 5। 32। 2)भगवान्ने कृपा करके भगवत्प्राप्तिरूप जिस उद्देश्यको लेकर जिन्हें मानव-शरीर दिया है, वे 'जनाः' (जन) कहलाते हैं। भगवान्का संकल्प मनुष्यमात्रके उद्धारके लिये बना है; अतः मनुष्यमात्र भगवान्की प्राप्तिका अधिकारी है। तात्पर्य है कि उस संकल्पमें भगवान्ने मनुष्यको अपने उद्धारकी स्वतन्त्रता दी है, जो कि अन्य प्राणियोंको नहीं मिलती; क्योंकि वे भोगयोनियाँ हैं और यह मानवशरीर कर्मयोनि है। वास्तवमें केवल भगवत्प्राप्तिके लिये ही होनेके कारण मानव-शरीरको साधनयोनि ही मानना चाहिये। इसलिये इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके मनुष्य शास्त्र-निषिद्ध कर्मोंको छोड़कर अगर भगवत्प्राप्तिके लिये ही लग जाय तो उसको भगवत्कृपासे अनायास ही भगवत्प्राप्ति हो सकती है। परन्तु जो मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके विपरीत मार्गपर चलते हैं, वे नरकों और चौरासी लाख योनियोंमें जाते हैं। इस तरह सबके उद्धारके भावको लेकर भगवान्ने कृपा करके जो मानव-शरीर दिया है, उस शरीरको पाकर भगवान्का भजन करनेवाले सुकृती मनुष्य ही जनाः अर्थात् मनुष्य कहलानेयोग्य हैं।        'आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ'--अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी--ये चार प्रकारके भक्त भगवान्का भजन करते हैं अर्थात् भगवान्के शरण होते हैं। (1) अर्थार्थी भक्त--जिनको अपनी न्याययुक्त सुख-सुविधाकी इच्छा हो जाती है अर्थात् धन-सम्पत्ति, वैभव आदिकी इच्छा हो जाती है, परन्तु उसको वे केवल भगवान्से ही चाहते हैं; दूसरोंसे नहीं, ऐसे भक्त अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं।चार प्रकारके भक्तोंमें अर्थार्थी आरम्भिक भक्त होता है। पूर्वसंस्कारोंसे उसकी धनकी इच्छा रहती है और वह धनके लिये चेष्टा भी करता है, पर वह समझता है कि भगवान्के समान धनकी इच्छा पूरी करनेवाला दूसरा कोई नहीं है। ऐसा समझकर वह धनप्राप्तिके लिये तत्परतापूर्वक भगवन्नामका जप-कीर्तन, भगवत्स्वरूपका ध्यान आदि करता है। धन प्राप्त करनेके लिये उसका भगवान्पर ही विश्वास, निष्ठा होती है।    जिसको धनकी इच्छा तो है, पर उसकी प्राप्तिके लिये वह सांसारिक उपायोंका सहारा लेता है और कभी धनके लिये भगवान्को भी याद कर लेता है, वह केवल अर्थार्थी अर्थात् अर्थका भक्त है, भगवान्का भक्त नहीं है। कारण कि उसमें धनकी इच्छा ही मुख्य है। परन्तु जिसमें भगवान्के सम्बन्धकी मुख्यता है, वह क्रमशः भगवान्की तरफ ही बढ़ता चला जाता है। भगवान्में लगे रहनेसे उसकी धनकी इच्छा बहुत कम हो जाती है और समय पाकर मिट भी जाती है। यही भगवान्का अर्थार्थी भक्त है। इसमें मुख्यता ध्रुवजीका नाम लिया जाता है।एक दिन बालक ध्रुवके मनमें राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर छोटी माँने बैठने नहीं दिया। उसने ध्रुवसे कहा कि 'तूने भजन नहीं किया है, तू अभागा है और अभागिनके यहाँ ही तूने जन्म लिया है; अतः तू राजाकी गोदमें बैठनेका अधिकारी नहीं है।' ध्रुवने छोटी माँकी कही हुई सब बात अपनी माँसे कह दी। माँने कहा कि 'बेटा! तेरी छोटी माँने ठीक ही कहा है; क्योंकि भजन न तूने किया और न मैंने ही किया।' इसपर ध्रुवने माँसे कहा कि 'माँ! अब तो मैं भजन करूँगा।' ऐसा कहकर वे भगवद्भजन करनेके लिये घरसे निकल पड़े और माँने भी बड़ी हिम्मत करके ध्रुवको जंगलमें जानेके लिये आज्ञा दे दी। रास्तेमें जाते हुए नारदजी महाराज मिल गये। नारदजीने ध्रुवसे कहा कि 'अरे भोले बालक! तू अकेला कहाँ जा रहा है? यों भगवान् जल्दी थोड़े ही मिलते हैं? तू जंगलमें कहाँ रहेगा ?वहाँ बड़े-बड़े जंगली जानवर हैं। वे तेरेको खा जायँगे। वहाँ तेरी माँ थोड़े ही बैठी है! तू मेरे साथ चल। राजा मेरी बात मानते हैं। मैं तेरा और तेरी माँका प्रबन्ध करवा दूँगा।' नारदजीकी बातोंको सुनकर ध्रुवकी भगवद्भजनमें और दृढ़ता हो गयी कि देखो, भगवान्की तरफ चलनेसे नारदजी भी इतनी बात कहते हैं। अब ये मेरेको घर चलनेके लिये कहते हैं, पर पहले ये कहाँ गये थे !ध्रुवने नारदजीसे कहा कि 'महाराज !मैं तो अब भगवान्का भजन ही करूँगा।' ध्रुवजीका ऐसा दृढ़ निश्चय देखकर नारदजीने उनको द्वादशाक्षर मन्त्र (ँ़ नमो भगवते वासुदेवाय) दिया और चतुर्भुज भगवान् विष्णुका ध्यान बताकर मधुवनमें जाकर भजन करनेकी आज्ञा दी।ध्रुवजीने मधुवनमें जाकर ऐसी निष्ठासे भजन किया कि उनकी निष्ठाको देखकर छः महीनेकी अवधिके भीतर-ही-भीतर भगवान् ध्रुवके सामने प्रकट हो गये। भगवान्ने ध्रुवजीको राजगद्दीका वरदान दिया, पर इस वरदानसे ध्रुवजी विशेष राजी नहीं हुए। भजनसे अन्तःकरण शुद्ध होनेके कारण उनको धन-(राज्य-) के लिये भगवान्की तरफ चलनेमें बड़ी लज्जा हुई कि मैंने बड़ी गलती की!     तात्पर्य यह हुआ कि ध्रुवजीको तो पहले राजाकी गोदमें बैठनेकी इच्छा हुई, पर उन्होंने उस इच्छाकी पूर्तिका मुख्य उपाय भगवान्का भजन ही माना। भजन करनेसे उनको राज्य मिल गया और इच्छा मिट गयी। इस तरह अर्थार्थी भक्त केवल भगवान्की तरफ ही लगता है।आजकल जो धन-प्राप्तिके लिये झूठ, कपट, बेईमानी आदि करते हैं वे भी धनके लिये समय-समयपर भगवान्को पुकारते हैं। वे अर्थार्थी तो हैं, पर भगवान्के भक्त नहीं हैं। वे तो झूठ, कपट, बेईमानी आदिके भक्त हैं; क्योंकि उनका 'पापके बिना, झूठ-कपटके बिना काम नहीं चलता'--इस तरह झूठ-कपट आदिपर जितना विश्वास है, उतना विश्वास भगवान्पर नहीं है।जो केवल भगवान्के ही परायण हैं और जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्का ही भजन करते हैं; परन्तु कभी-कभी पूर्व-संस्कारोंसे अथवा किसी कारणसे जिनमें अपने शरीर आदिके लिये अनुकूल परिस्थितिकी इच्छा हो जाती है, वे भी अर्थार्थी भक्त कहलाते हैं। उनकी अनुकूलताकी इच्छा ही अर्थार्थीपन है। (2) 'आर्त भक्त'--प्राण-संकट आनेपर, आफत आनेपर, मनके प्रतिकूल घटना घटनेपर जो दुःखी होकर अपना दुःख दूर करनेके लिये भगवान्को पुकारते हैं और दुःखको दूर करना केवल भगवान्से ही चाहते हैं, दूसरे किसी उपायको काममें नहीं लेते, वे आर्त भक्त कहलाते हैं। आर्त भक्तोंमें उत्तरका दृष्टान्त लेना ठीक बैठता है (टिप्पणी प0 417.1)। कारण कि जब उसपर आफत आयी, तब उसने भगवान्के सिवाय अन्य किसी उपायका सहारा नहीं लिया। अन्य उपायोंकी तरफ उसकी दृष्टि ही नहीं गयी। उसने केवल भगवान्का ही सहारा लिया (टिप्पणी प0 417.2)। तात्पर्य यह हुआ कि सकामभाव रहनेपर भी आर्त भक्त उसकी पूर्ति केवल भगवान्से ही चाहते हैं। जो भगवान्के साथ अपनापन करके भगवान्के परायण हैं और अनुकूलताकी वैसी इच्छा नहीं करते; पर प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर इच्छा हो जाती है कि भगवान्ने ऐसा क्यों किया? 'यह प्रतिकूलता मिट जाय तो बहुत अच्छा है।' इस प्रकार प्रतिकूलता मिटानेका भाव पैदा होनेसे वे भी आर्त भक्त कहलाते हैं। (3) जिज्ञासु भक्त--जिसमें अपने स्वरूपको, भगवत्तत्त्वको जाननेकी जोरदार इच्छा जाग्रत् हो जाती है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है? इस प्रकार तत्त्वको जाननेके लिये शास्त्र, गुरु अथवा पुरुषार्थ (श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि उपायों) का भी आश्रय न रखते हुए केवल भगवान्के आश्रित होकर उस तत्त्वको केवल भगवान्से ही जो जानना चाहते हैं; वे जिज्ञासु भक्त कहलाते हैं।जिज्ञासु भक्त वही होता है, जिसका जिज्ञास्य केवल भगवत्तत्त्व और उपाय केवल भगवद्भक्ति ही होती है अर्थात् उपेय और उपायमें अनन्यता होती है। जिज्ञासु भक्तोंमें उद्धवजीका नाम लिया जाता है। भगवान्ने उद्धवजीको दिव्यज्ञानका उपदेश दिया था, जो 'उद्धवगीता' (श्रीमद्भागवत 11। 7 30) के नामसे प्रसिद्ध है।जो भगवान्में अपनापन करके भगवान्के भजनमें ही तल्लीन रहते हैं; परन्तु कभी-कभी सङ्गसे, संस्कारोंसे मनमें यह भाव पैदा हो जाता है कि वास्तवमें मेरा स्वरूप क्या है? भगवत्तत्त्व क्या है ?वे भी जिज्ञासु कहलाते हैं। (4) ज्ञानी (प्रेमी) भक्त--अर्थार्थी, आर्त और जिज्ञासु--तीनों भक्तोंसे ज्ञानी भक्तकी विलक्षणता बतानेके लिये यहाँ 'च' अव्यय आया है।ज्ञानी भक्तको अनुकूल-से-अनुकूल और प्रतिकूल-से-प्रतिकूल परिस्थिति, घटना, व्यक्ति, वस्तु आदि सब भगवत्स्वरूप ही दीखते हैं अर्थात् उसको अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति केवल भगवल्लीला ही दीखती है। जैसे भगवान्में अपने लिये अनुकूलता प्राप्त करने, प्रतिकूलता हटाने बोध प्राप्त करने आदि किसी तरहकी कभी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा होती ही नहीं, वे तो केवल भक्तोंके प्रेममें ही मस्त रहते हैं; ऐसे ही ज्ञानी (प्रेमी) भक्तोंमें किञ्चिन्मात्र भी कोई इच्छा नहीं होती, वे केवल भगवान्के प्रेममें ही मस्त रहते हैं। ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्तोंमें गोपिकाओंका नाम प्रसिद्ध है। देवर्षि नारदजीने भी यथा व्रजगोपिकानाम् (भक्तिसूत्र 21) कहकर गोपियोंको प्रेमी भक्तोंका आदर्श माना है। कारण कि गोपियोंमें अपने सुखका सर्वथा त्याग था। प्रियतम भगवान्का सुख ही उनका सुख था।यहाँ एक बात समझनेकी है कि धनकी इच्छा, दुःख दूर करनेकी इच्छा और जिज्ञासा-पूर्तिकी इच्छाको लेकर जो भगवान्की तरफ लगते हैं, उनमें तो भगवान्का प्रेम जाग्रत् हो जाता है और वे भक्त कहलाते हैं। परन्तु जिनकी यह भावना रहती है कि अन्य उपायोंसे धन मिल सकता है, दुःख दूर हो सकता है, जिज्ञासा-पूर्ति हो सकती है, उनका भगवान्के साथ सम्बन्ध न होनेसे उनमें प्रेम जाग्रत् नहीं होता और उनकी भक्त संज्ञा नहीं होती।संतोंकी वाणीमें आता है कि प्रेम तो केवल भगवान् ही करते हैं ,भक्त केवल भगवान्में अपनापन करता है। कारण कि प्रेम वही करता है, जिसे कभी किसीसे कुछ भी लेना नहीं है। भगवान्ने जीवमात्रके प्रति अपने-आपको सर्वथा अर्पित कर रखा है और जीवसे कभी कुछ भी प्राप्त करनेकी इच्छाकी कोई सम्भावना ही नहीं रखी है। इसलिये भगवान् ही वास्तवमें प्रेम करते हैं। जीवको भगवान्की आवश्यकता है इसलिये जीव भगवान्से अपनापन ही करता है। जब अपनेआपको सर्वथा भगवान्के अर्पित करनेपर भक्तमें कभी कुछ भी पानेकी कोई अभिलाषा नहीं रहती, तब वह ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त कहा जाता है। अपने-आपको सर्वथ भगवान्के अर्पित कर देनेसे उस भक्तकी सत्ता भगवान्से किञ्चिन्मात्र भी अलग नहीं रहती, प्रत्युत उसकी जगह केवल भगवान्की सत्ता ही रह जाती है। विशेष बात (1) चार लड़के खेल रहे थे। इतनेमें उनके पिताजी चार आम लेकर आये। उनको देखते ही एक लड़का आम माँगने लग गया और एक लड़का आम लेनेके लिये रो पड़ा। पिताजीने उन दोनोंको एक-एक आम दे दिया।तीसरा लड़का न तो रोता है और न माँगता है, केवल आमकी तरफ देखता है और चौथा लड़का आमकी तरफ न देखकर जैसे पहले खेल रहा था, वैसे ही मस्तीसे खेल रहा है। उन दोनोंको भी पिताजीने एक-एक आम दे दिया। इस प्रकार चारों ही लड़कोंको आम मिलता है। यहाँ आम माँगनेवाला लड़का अर्थार्थी है, रोनेवाला लड़का आर्त है, केवल आमकी तरफ देखनेवाला जिज्ञासु है और आमकी परवाह न करके खेलमें लगे रहनेवाला लड़का ज्ञानी है। ऐसे ही अर्थार्थी भक्त भगवान्से अनुकूलता माँगता है, आर्त भक्त भगवान्से प्रतिकूलता दूर कराना चाहता है, जिज्ञासु भक्त भगवान्को जानना चाहता है और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त भगवान्से कुछ भी नहीं चाहता। अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी--ये चारों ही भक्त भगवन्निष्ठ हैं। अतः इनको योगभ्रष्ट पुरुषों (गीता 6। 41 42) में नहीं लिया जा सकता। ऐसे ही अर्थार्थी और आर्त--ये दोनों सकाम पुरुषोंसे अलग हैं; क्योंकि इन दोनों भक्तोंमें भगवान्का आश्रय मुख्य है। सकाम पुरुष कामनापूर्तिमें ही लगे रहनेके कारण 'हृतज्ञानाः' हैं (गीता 7। 20), इसलिये उनको आसुरी सम्पत्तिवाले पुरुषोंमें लिया गया है। यद्यपि अर्थार्थी आदि भक्तोंमें जो कुछ न्यूनाधिकता है, वह कामनाके कारण ही है, परन्तु कामना होते हुए भी वे 'हृतज्ञानाः'नहीं हैं। उनको तो भगवान्ने 'सुकृतिनः'और 'उदाराः'(7। 18) कहा है। जो भगवान्के शरण होते हैं, उनमें सकामभाव भी हो सकता है; परन्तु उनमें मुख्यता भगवन्निष्ठ होनेकी ही होती है। इसलिये उनकी भगवान्के साथ जितनी-जितनी घनिष्ठता होती जाती है, उतना-उतना ही उनमें सकामभाव मिटता जाता है और विलक्षणता आती जाती है। इसलिये उनको भगवान्ने 'उदाराः' कहा है और ज्ञानी भक्तको अपना स्वरूप बताया है--'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्'(7। 18)। (2) भगवान्के साथ अपनापन माननेके समान दूसरा कोई साधन नहीं है, कोई योग्यता नहीं है, कोई बल नहीं है, कोई अधिकारिता नहीं है। भगवान्का प्राणिमात्रपर अपनापन सदासे है और सदा ही रहेगा। उस अपनेपनको केवल प्राणी ही भूला है और उसने भूलसे संसारके साथ अपनापन मान लिया है। अतः इस भूलसे किये हुए अपनेपनको हटाना है और प्रभुके साथ जो स्वतःसिद्ध अपनापन है, उसको मानना है। प्रभुको अपना माननेमें मन, बुद्धि आदि किसीकी सहायता नहीं लेनी पड़ती, जबकि दूसरे साधनोंमें मन, बुद्धि आदिकी सहायता लेनी पड़ती है।भगवान्के साथ अपनापन होनेपर अर्थात् 'मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं '--ऐसा दृढ़तासे मान लेनेपर साधक भक्तको अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें भावोंकी, गुणोंकी कमी भी दीख सकती है, पर भगवान्के साथ अपनापन होनेसे वह टिकेगी नहीं। दूसरी बात, साधक भक्तमें कुछ गुणोंकी कमी रहनेपर भी भगवान्की दृष्टि केवल अपनेपनपर ही जाती है, गुणोंकी कमीपर नहीं। कारण कि भगवान्के साथ हमारा जो अपनापन है, वह वास्तविक है।भगवान्का अपनापन तो दुष्ट-से-दुष्ट मनुष्यपर भी वैसा ही है। इसलिये सोलहवें अध्यायमें आसुरी प्रकृतिवालोंका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि 'क्रूर, द्वेष करनेवाले, नराधम दुष्टोंको मैं आसुरी योनियोंमें गिराता हूँ।' इस प्रकार भगवान् उनको आसुरी योनियोंमें गिराकर शुद्ध करते हैं। जैसे माता अपने बच्चेको स्नान कराती है तो उसकी सम्मति नहीं लेती, ऐसे ही उनको शुद्ध करनेके लिये भगवान् उनकी सम्मति नहीं लेते; क्योंकि भगवान्का उनपर अपनापन है।     भगवान्के साथ अपनापनका सम्बन्ध पहलेसे ही है। फिर भी कोई कामना उत्पन्न हो जाती है तो भक्तका भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध मुख्य होता है और कामना गौण होती है। इस दृष्टिसे ये भक्त पहली श्रेणीके हैं।भगवान्का सम्बन्ध तो पहलेसे ही है, पर समयसमयपर कामना उत्पन्न हो जाती है, जिसकी पूर्ति दूसरोंसे चाहते हैं। जब दूसरोंसे कामनाकी पूर्ति नहीं होती, तब अन्तमें भगवान्से चाहते हैं। इस तरह अनन्यताकी कमी होनेके कारण ये भक्त दूसरी श्रेणीके हैं।जहाँ केवल कामना-पूर्तिके लिये ही भगवान्के साथ अपनेपनका सम्बन्ध किया जाय, वहाँ कामना मुख्य होती है और भगवान्का सम्बन्ध गौण होता है। इस दृष्टिसे ये भक्त तीसरी श्रेणीके हैं। मार्मिक बातकामना दो तरहकी होती है--पारमार्थिक और लौकिक।(1) पारमार्थिक कामना--पारमार्थिक कामना दो तरहकी होती है--मुक्ति-(कल्याण-) की और भक्ति-(भगवत्प्रेम-) की। जो मुक्तिकी कामना है, उसमें तत्त्वको जाननेकी इच्छा होती है, जिसे जिज्ञासा कहते हैं। यह जिज्ञासा जिसमें होती है, वह जिज्ञासु होता है। गहरा विचार किया जाय तो जिज्ञासा कामना नहीं है; क्योंकि वह अपने स्वरूपको अर्थात् तत्त्वको जानना चाहता है, जो वास्तवमें उसकी आवश्यकता है। आवश्यकता उसको कहते हैं, जो जरूर पूरी होती है और पूरी होनेपर फिर दूसरी आवश्यकता पैदा नहीं होती (टिप्पणी प0 419.1)। यह आवश्यकता सत्-विषयकी होती है। दूसरी कामना प्रभु-प्रेम-प्राप्तिकी होती है। उसको प्राप्ति तो कहते हैं, पर वास्तवमें वह प्राप्ति अपने लिये नहीं होती, प्रत्युत प्रभुके लिये ही होती है। उसमें अपना किञ्चिन्मात्र प्रयोजन नहीं रहता; प्रभुके समर्पित होनेका ही प्रयोजन रहता है। प्रेमी तो अपने-आपको प्रभुके समर्पित कर देता है, जो कि उसीका अंश है (टिप्पणी प0 419.2)।उपर्युक्त दोनों ही पारमार्थिक कामनाएँ वास्तवमें 'कामना' नहीं हैं। (2) लौकिक कामना--लौकिक कामना भी दो तरहकी होती है--सुख प्राप्त करनेकी और दुःख दूर करनेकी।शरीरको आराम मिले; जीते-जी मेरा आदर-सत्कार होता रहे और मरनेके बाद मेरा नाम अमर हो जाय, मेरा स्मारक बन जाय; कोई ग्रन्थ बना दे, जिसको लोग देखते रहें, पढ़ते रहें और यह जान जायँ कि ऐसा कोई विलक्षण पुरुष हुआ है; मरनेके बाद स्वर्ग आदिमें भोग भोगते रहें आदि-आदि लौकिक सुख-प्राप्तिकी कामनाएँ होती हैं। ऐसी कामनाओंसे तो वासना ही बढ़ती है, जिससे बन्धन और पतन ही होता है, उद्धार नहीं होता। यह कामना आसुरी सम्पत्ति है, इसलिये यह त्याज्य है।दूसरी कामना दुःख दूर करनेकी है। दुःख तीन प्रकारके हैं--आधिदैविक आधिभौतिक और आध्यात्मिक।अतिवृष्टि, अनावृष्टि, सरदी-गरमी, वायु आदिसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिदैविक' कहते हैं। यह दुःख देवताओंके अधिकारसे होता है।सिंह, साँप, चोर आदि प्राणियोंसे जो दुःख होता है, उसको 'आधिभौतिक' कहते हैं। शरीर और अन्तःकरणको लेकर जो दुःख होता है, वह 'आध्यात्मिक' होता है (टिप्पणी प0 420.1)।इन दुःखोंको दूर करनेकी और सुख प्राप्त करनेकी जो कामना होती है, वह सर्वथा निरर्थक है; क्योंकि उस कामनाकी पूर्ति नहीं होती। पूर्ति हो भी जाती है तो दूसरी नयी कामना पैदा हो जाती है और अन्तमें अपूर्ति ही बाकी रहती है। इसलिये इन दोनों कामनाओंकी पूर्ति किसी भी मनुष्यकी कभी भी नहीं हुई, न होती है और न भविष्यमें ही पूरी होनेवाली है।  सम्बन्ध--पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों भक्तोंमेंसे ज्ञानी भक्तकी विशेषताका विशद वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं--

English Translation + Commentary by A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada

English Translation

O best among the Bhāratas, four kinds of pious men begin to render devotional service unto Me – the distressed, the desirer of wealth, the inquisitive, and he who is searching for knowledge of the Absolute.

English Commentary

Unlike the miscreants, these are adherents of the regulative principles of the scriptures, and they are called su-kṛtinaḥ, or those who obey the rules and regulations of scriptures, the moral and social laws, and are, more or less, devoted to the Supreme Lord. Out of these there are four classes of men – those who are sometimes distressed, those who are in need of money, those who are sometimes inquisitive, and those who are sometimes searching after knowledge of the Absolute Truth. These persons come to the Supreme Lord for devotional service under different conditions. These are not pure devotees, because they have some aspiration to fulfill in exchange for devotional service. Pure devotional service is without aspiration and without desire for material profit. The Bhakti-rasāmṛta-sindhu (1.1.11) defines pure devotion thus: anyābhilāṣitā-śūnyaṁ jñāna-karmādy-anāvṛtam ānukūlyena kṛṣṇānu- śīlanaṁ bhaktir uttamā “One should render transcendental loving service to the Supreme Lord Kṛṣṇa favorably and without desire for material profit or gain through fruitive activities or philosophical speculation. That is called pure devotional service.” When these four kinds of persons come to the Supreme Lord for devotional service and are completely purified by the association of a pure devotee, they also become pure devotees. As far as the miscreants are concerned, for them devotional service is very difficult because their lives are selfish, irregular and without spiritual goals. But even some of them, by chance, when they come in contact with a pure devotee, also become pure devotees. Those who are always busy with fruitive activities come to the Lord in material distress and at that time associate with pure devotees and become, in their distress, devotees of the Lord. Those who are simply frustrated also come sometimes to associate with the pure devotees and become inquisitive to know about God. Similarly, when the dry philosophers are frustrated in every field of knowledge, they sometimes want to learn of God, and they come to the Supreme Lord to render devotional service and thus transcend knowledge of the impersonal Brahman and the localized Paramātmā and come to the personal conception of Godhead by the grace of the Supreme Lord or His pure devotee. On the whole, when the distressed, the inquisitive, the seekers of knowledge, and those who are in need of money are free from all material desires, and when they fully understand that material remuneration has nothing to do with spiritual improvement, they become pure devotees. As long as such a purified stage is not attained, devotees in transcendental service to the Lord are tainted with fruitive activities, the search for mundane knowledge, etc. So one has to transcend all this before one can come to the stage of pure devotional service.