Valmiki Ramayana Kishkindha Kanda Sarga 11 Shloka 87
Original Shlokaआर्द्रस्समांसः प्रत्यग्रः क्षिप्तः कायः पुरा सखे4.11.87।। लघुस्सम्प्रति निर्मांस स्तृणभूतश्च राघव। परिश्रान्तेन मत्तेन भ्रात्रा मे वालिना तदा4.11.88।। क्षिप्तमेवं प्रहर्षेण भवता रघुनन्दन।